पटना वाले बाबा 80 साल की उम्र में रेलवे स्टेशन के बाहर आलू पराठा बेचकर ऐसे पेट पालते हैं

दोस्तों हम सब जानते हैं एक इंसान के जीवन में परिवार का कितना बड़ा महत्व है, लोग शादी करते हैं जीवनसंगिनी लेकर आते हैं, ताकि वह जीवन भर साथ दे अच्छे और बुरे दोनों समय में और मिलकर के बच्चों को तैयार करते हैं उन्हें पढ़ाते लिखाते हैं बड़ा करते हैं। उसके पीछे एक ही उद्देश्य होता है कि बच्चों को आज वह प्यार देंगे, पढ़ लिख के किसी लायक बना देंगे। बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो सकेंगे और जब हम बूढ़े हो जाएंगे उम्र की वजह से कुछ करने लायक नहीं होंगे तब यही बच्चे हमारे बुढ़ापे का सहारा या बुढ़ापे की लाठी की तरह काम आएंगे।

आज यह कलयुग चल रहा है दोस्तों और आए दिन हम देखते हैं कि वृद्ध आश्रमों में वृद्धों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। ऐसा ही एक केस सामने आया है, जिसमें 80 साल का एक बुजुर्ग अपने जीवन यापन के लिए अपनी बुजुर्ग पत्नी के साथ एक छोटी सी रसोई चलाता है, जिसके जरिए वह अपना जीवन यापन कर रहा आज हम उनकी यह स्टोरी आपसे शेयर करने वाले हैं। पटना रेलवे स्टेशन के बाहर इस पिलर के पास लगाते हैं दुकान

हम किस बुजुर्ग की बात कर रहे हैं उनका नाम है उपाध्याय झा, इनकी उम्र लगभग 80 वर्ष हो चुकी है और यह बिहार (Bihar) के कैपिटल पटना (Patana) शहर के अंदर रेलवे स्टेशन रोड (Railway Station Road) पे पड़ने वाली एक जगह है, जिसे चिरैया तार के नाम से जाना जाता है। उसके समीप ही 28 नंबर वाले पिलर के आगे अपनी झोपड़ी नुमा दुकान चलाते हैं,

जहां यह सत्तू के साथ पराठा बनाकर के लोगों को खिला रहे हैं। आप इनकी दुकान की हालत देखकर समझ सकते हैं कि यह सिर्फ जीवन यापन करने लायक ही कमा पा रहे हैं अर्थात यह लोगों को खाना खिला कर सिर्फ खुद का ही पेट भर पाते हैं। इस उम्र तक आते आते जीवन के इतने उतार-चढ़ाव देखने के बाद वो यह महसूस करते हैं कि जैसा भी जीवन है ऐसे ही काटना है। बच्चे भी हैं पर उन्होंने छोड़ा असहाय इसलिए काम करने को मजबूर हमने जब बाबा से बातचीत का दौर आगे बढ़ाया तो शुरू में तो उन्होंने खुल करके अपने जीवन के बारे में कुछ खास नहीं बताया, पर जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ी, वह थोड़ा सहज हुए। उसके बाद उन्होंने जो बताया उसे सुनकर एक बार तो मन अंदर से हिल गया।

जी हां दोस्तों बाबा ने बताया कि उनके दो बच्चे हैं एक बेटा और एक बेटी शुरू से ही अथाह मेहनत करके दोनों बच्चों को उन्होंने पढ़ाया और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया, जिसमें बेटा उनका दिल्ली की किसी बड़ी कंपनी में जॉब करता है और अपने परिवार के साथ दिल्ली में ही कहीं एक फ्लैट में रहता है। परंतु कई अरसों से उसने अपने मां-बाप अर्थात बाबा कि ना कोई खबर ली और ना ही वह ने जीवन यापन करने के लिए किसी प्रकार का सपोर्ट देता है। 75 वर्षीय पत्नी देती है साथ बाबा जी दुकान चलाते हैं उस पर वो अपने ग्राहकों को सत्तू और पराठा बेचते हैं भोजन के रूप में और एक प्लेट की कीमत मात्र 30 RS होती है। इस एक प्लेट में आपको चार पराठे के साथ सब्जी परोसी जाती है।

बातचीत के दौरान बाबा जी ने बताया कि वह ऐसा मानते हैं कि जैसे आज मैं गरीब हूं, ऐसे बहुत से लोग होते हैं, जो पर्याप्त कमाई नहीं करते मैं उनके लिए ही इतने सस्ते कीमत में भोजन ऑफर करता हूं ताकि हर कोई कम से कम भोजन प्राप्त कर सके। चूंकि उम्र हो चली है तो इतना सारा काम वो अकेले नहीं कर पाते, तो दुकान के सारे काम में उनकी 75 वर्षीय पत्नी भी पूरे समय उनका सहयोग करती रहती है। हम कहेंगे कि दोनों बुजुर्ग आज सिर्फ जीवन यापन करने के लिए यह भोजन की दुकान चला रहे, अपने कंपकंपाते हुए हुए शरीर और हाथों के जरिए। एक बार जरूर जाए इन बाबा के हाथ का खाना खाने इंसानियत के नाते दोस्तों हम ये तो नही कह सकते कि आप इन बुजुर्ग बाबा (Old Baba) की कितनी मदद कर सकते हैं, परंतु यह जरूर कहना चाहेंगे कि यदि आप पटना या उसके आसपास के हैं, तो कभी कभार उनके हाथों का भोजन करने अवश्य जाइए जहां एक ओर इनका मनोबल बढ़ेगा।

वहीं दूसरी और आपको इनकी सेवा का सुख भी प्राप्त होगा हमें समाज में जरूर ऐसी कोई व्यवस्था बनानी होगी कि कोई भी बुजुर्ग अपनी उम्र के इस पड़ाव में ऐसे जीवन जीने को मजबूर ना हो समाज सुधार में कुछ ऐसी पॉलिसीज का आना बहुत जरूरी है मानवता के लिए।

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