जयपुर से दिल्ली के बीच 1 हजार गांवों में इतिहास लेखन का काम शुरू हो चूका है

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इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील का प्रभाव कहें या फिर भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष ओपी धनखड़ के आह्वान का असर। कारण कुछ भी हो, मगर यह सच है कि उन महापुरुषों की गौरवगाथाएं लिखने का काम शुरू हो गया है, जिन्हें विभिन्न कारणों से इतिहास के पन्नों में जगह नहीं मिल पाई। ‘सांस्कृतिक अहीरवाल’ संगठन भी इस दिशा में बड़ी पहल कर चुका है।

संगठन अहीरवाल क्षेत्र को दिल्ली व गुड़गांव, अलवर व जयपुर, सीकर व झुंझुनू, महेंद्रगढ़ व नारनौल तथा कोसली व रेवाड़ी जोन में बांटकर यहां के एक हजार गांवों में इतिहास लेखन का काम शुरू कर चुका है। सांस्कृतिक अहीरवाल ने पांच जोन में लगभग 2500 गांव चिह्नित किए हैं। इन सभी गांवों का इतिहास संकलित करके लिखा जाएगा।

सांस्कृतिक विरासत को संजोने का काम- संगठन के माध्यम से अहीरवाल की सांस्कृतिक विरासत को संजोने का काम किया जाएगा। संगठन बड़े स्तर पर ऐसे छुपे हुए महापुरुषों की गौरवगाथा संकलित कर रहा है, जिन्होंने अपने गांव का गौरव बढ़ाया, मगर वह इतिहास में अनाम रह गए।

अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए संगठन की पिछली बैठक 19 सितंबर 2021 को बहरोड़ में हुई थी। बहरोड़ के बाद इस बार 24 अप्रैल को रेवाड़ी में संगठन के कोर ग्रुप की बैठक होगी। इस बैठक में अब तक हुए काम की समीक्षा के अलावा आगामी कार्ययोजना पर विचार होगा।

कोर ग्रुप की बैठक हर 6 माह में एक बार आयोजित की जाती है। सांस्कृतिक अहीरवाल के संभाग प्रमुख सुरेंद्रपाल एडवोकेट के अनुसार रेवाड़ी के श्री कृष्ण भवन (यादव धर्मशाला) में होने वाली इस बैठक में अहीरवाल की संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन के लिए व्यापक विचार-विमर्श होगा। कुल 11 बिंदुओं पर आधारित इस कार्ययोजना के अंतर्गत क्षेत्र में आने वाले सभी गांवों का स्वतंत्र व व्यापक इतिहास लिखा जाएगा।

संगठन ने पांच संभागों को 10 भागों में बांटा है। इन दस भागों को भी 50 उपभागों में बांटकर इतिहास लेखन के लिए संगठन तैयार किया है। ये सभी 50 उपभाग पंचायत समिति के आधार पर बनाए गए हैं। एक उपभाग में एक पंचायत समिति की सभी ग्राम पंचायतों को रखा गया है। पिछले एक वर्ष में इन सभी 50 उपभागों तक सक्रिय टीम बन चुकी है। 24 अप्रैल की बैठक में संपूर्ण अहीरवाल का प्रतिनिधित्व रहेगा।

सांस्कृतिक अहीरवाल के निदेशक सत्यव्रत शास्त्री ने बताया कि अहीरवाल की संस्कृति के प्राचीन वैभव को विश्व पटल पर स्थापित करने के लिए अब संपूर्ण क्षेत्र में एक वातावरण का निर्माण हो रहा है और शीघ्र ही इस संस्कृति के साधक अपनी साधना से सब लोगों को इसकी प्राचीनता, श्रेष्ठता और व्यापकता को समझाएंगे।

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