देशभक्त अक्षय कुमार की फिल्म में शिमला का सीन लंदन से क्यों फिल्माया जा रहा है? क्या शिमला खूबसूरत नहीं है?

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    बॉलीवुड में सबसे अधिक फिल्म हर साल रिलीज़ करने वाले अभिनेता अक्षय कुमार एक साल में 3-4 फिल्म रिलीज़ कर देते है। खिलाड़ी कुमार नाम से मशहूर अक्षय कुमार बॉलीवुड में सबसे अधिक टैक्स देने वाले अभिनेता है। अक्षय कुमार की सभी फिल्में 100 करोड़ से अधिक की कमाई करती है। अक्षय कुमार उन अभिनेताओं में से एक है जो इंडियन आर्मी के लिए हर साल बहुत कुछ करती है।

    ताज्जुब तब होता है जब खुद को ‘राष्ट्रवादी’ और बहुत सोशल दिखाने वाले अक्षय कुमार जैसे अभिनेता भी इन चीजों का ख्याल नहीं रखते। मिशन सिंड्रेला के प्रोडक्शन डिजाइनर के हवाले से दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ अक्षय की फिल्म की शूटिंग लंदन में होगी। एक्टर 25 अगस्त से मिशन सिंड्रेला के शूट में शामिल होंगे। मजेदार बात यह है कि मिशन सिंड्रेला की कहानी में लंदन का जिक्र नहीं है बल्कि कहानी शिमला में है और इसे लंदन की किसी नकली लोकेशन के जरिए दिखाया जाएगा। शिमला का थाना बनेगा, वहां जैसे घर बनाए जाएंगे। लॉजिक ये दिया गया कि कलाकारों की डेट्स एक साथ मिल जाएगी। लंदन में 20 फीसदी सब्सिडी मिलेगी। और भी कुछ दूसरी रियायतें मिल जाएंगी।

    मन में कई सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या वाकई लंदन, शिमला से भी सस्ता है? क्या देश में जिन फिल्मों की शूटिंग होती है उसके लिए कलाकार तारीखें ही नहीं देते हैं? क्या इस वक्त देश में आउटडोर लोकेशन पर फिल्म इंडस्ट्री को कोरोना की वजह से बहुत सारी पाबंदियों का सामना करना पड़ रहा है। क्या शिमला के बैकड्रॉप को लंदन में रीक्रिएट करना, फिल्म से जुड़े लोगों का वहां आना-जाना और रुकना, 20 फीसदी सब्सिडी के बावजूद सस्ता होगा? और सबसे बड़ा सवाल कि मौजूदा मुश्किल दौर में छोटे शहरों के लोग रोजी रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं ऐसे में अक्षय कुमार के लिए 20 प्रतिशत की सब्सिडी ज्यादा आकर्षक है? सवाल इसलिए भी क्योंकि जिस रिपोर्ट का ऊपर हवाला दिया गया है उसी में बताया गया कि “प्रायोगिक” आइडिया के पीछे अक्षय कुमार का दिमाग है और उन्होंने बेलबॉटम के लिए ग्लासगो में इसी तरह चंडीगढ़ को रीक्रिएट करवाया था।

    अक्षय को शायद पता ही होगा कि शिमला, टूरिस्ट सिटी है। ऐसा शहर जिसकी अर्थव्यवस्था काफी कुछ पर्यटन के दम पर ही है। कोरोना ने सबसे ज्यादा पर्यटन और उससे जुड़े कारोबार पर ही असर डाला है। होटल व्यवसाय पिछले साल से ही पूरी तरह से लगभग ठप पड़े हैं। ऐसे में शिमला की शूटिंग थोड़ी बहुत मुश्किलों के साथ यहीं होती तो क्या बुराई थी। कम से कम अक्षय तो सक्षम थे कि वो दूसरी रियायतें और रिसोर्स मांग सकते थे। मिशन सिंड्रेला का शूट अगर शिमला में होता तो ना जाने कितने लोग मुश्किल दौर में रोजी-रोजगार हासिल कर लेते। ये दुर्भाग्य कि जिस वक्त तमिल सिनेमा के दर्जनों दिग्गज एक पूरी वेबसीरीज (नवरस) के लिए मुफ्त में काम करने आगे आए और उसकी पूरी कमाई को इंडस्ट्री के मजदूरों को समर्पित कर कर नजीर बनाई, हमारा ‘देशभक्त’ हीरो 20 फीसदी सब्सिडी के लिए ताम-झाम के साथ लंदन शूट करने जाएगा। जबकि उन्हें फिल्म यहीं बेचनी है। सरकार से सुविधाएं यहीं लेनी हैं। टैक्स से रियायतें यहीं मांगना है। लेकिन जब उन्हें वाजिब तरीके से देने की बारी आती है तो एक्सक्यूज खड़ा करके बाहर निकल जाते हैं।

    अक्षय और मिशन सिंड्रेला के निर्माताओं को बजट नहीं बचाना है। बजट ही बचाना होता तो यहीं मुंबई में ही किसी स्टूडियों में शिमला के बैकड्रॉप को बना लेते। डिजिटल के दौर में तो ये बेहद आसान चीज है। लोग भांप भी नहीं पाते कि जिस शिमले को देख रहे हैं वो मुंबई में किसी जगह शूट की गई है। असल में तो काम के साथ विदेशी तफरी की कवायद ज्यादा नजर आती है। और फिल्मों के बहाने तफरी की ये आदत काफी पुरानी है। 90 के बाद तो बॉलीवुड के निर्माताओं के लिए ये सब खर्चीला लेकिन जरूरी रूटीन ही बन गया था। कहानियों में ऐसे सीक्वेंस घुसाए जाते थे जो नहीं भी होता तो कोई फर्क नहीं पड़ता।

    हीरो या हीरोइन अमीर है। वो विदेश में रहता है। हीरो या हीरोइन विदेश में घूमने जाती हैं या भारत घूमने आते हैं। एक दूसरे से टकराते हैं। प्यार हो जाता है और फिर कहानी भारत में चली आती है। ज्यादातर पंजाब के गांव। क्या बैकड्रॉप में मुंबई/बेंगलुरु/चेन्नई जैसे शहरों से हीरो या हीरोइन की अमीरी नहीं दिखाई जा सकती थी। क्या देश के टॉप कारोबारी विदेश में ही रहते हैं और वहीं रहकर रुपया बनाया। हद तो तब हो जाती थी जब गोविंदा जैसे सितारों की फिल्म जो विशुद्ध गली मोहल्ले की कहानी होती थी लेकिन उसमें भी गानों की शूट के लिए विदेशी लोकेशन का इस्तेमाल किया जाता था। अतरंगी ड्रेस में गोविंदा, करिश्मा कपूर के साथ सड़कों पर नाच रहे हैं और फ्रेम में नजर आने वाली विदेशी भीड़ कौतूहल जताते दिख रही- भाई ये हो क्या रहा है? हीरोइन स्विटजरलैंड के हाड़ कंपा देने वाले लोकेशन में झीनी साड़ी में नाच रही है। या अरब के रेगिस्तान में शाहरुख अपना सिग्नेचर पोज दे रहे हैं। मिडिल ईस्ट का रेत ख़ूबसूरत है। भला कच्छ और थार के रेगिस्तान किन अर्थों में बदसूरत नजर आते हैं। सवाल है कि क्या तब गानों भर की शूटिंग से फिल्म का बजट नियंत्रित हो जाता था।

    नहीं। विदेशी लोकेशन पर शूट बजट या जो दूसरी वजहें बताई जाती हैं वो बेमतलब है। जिन कहानियों में विदेश था वहां जरूरी है। लेकिन बॉलीवुड की अन्य फिल्मों में जबरदस्ती के आउटडोर लोकेशन का इस्तेमाल हुआ है। एक दशक पहले तक इस तरह की चर्चाएं भी आती थीं कि फिल्मों के बड़े सितारे निर्माताओं से आउटडोर शूटिंग रखवाते थे। ये एक तरह से निर्माता के पैसों पर सामूहिक तफरी का उपक्रम नजर आता है। विदेशी शूट का दौर तब कमजोर हुए जब बॉलीवुड का सिनेमा लोकल कहानियों की ओर भागने लगा। छोटे बजट की अर्थपूर्ण फ़िल्में बनना शुरू हुई। पर अब ट्रेंड फिर वापस आता दिख रहा है। कई फ़िल्में विदेशी लोकेशन पर जाती नजर आ रही हैं। महामारी के बाद तो ऐसी उम्मीद नहीं थी। फिल्म उद्योग को कोशिश करनी चाहिए कि थोड़ी मुश्किलों के साथ देश में ही शूट करें। ताकि जरूरतमंद लोगों को काम मिलता रहे। कारोबार की गति बढ़ती रहे। क्योंकि फिल्म उद्योग की बेहतरी और कमाई के पीछे यहां के लोगों का भी हिस्सा और योगदान है।

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